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मौसम, बेमौसम, बादलों की गड़गड़ाहट सुनते ही, दादी - अपने शरीर में बची सारी तेजी का इस्तेमाल करते, वह नौ ग़ज़ लंबी सादी संभालते - घर के बाहर आ, आसमान की तरफ देखती है, की गांव में भी बारिश हो रही होगी क्या?
दादी जब जब बारिश देखती, तो पहले देखती है महीना। (मई या अगस्त या अक्तूबर)
महीने की तारीख। (जून की सात तारीख या अगस्त का चौथा हफ्ता या अक्तूबर का आखिरी दिन)
और बारिश की तीव्रता (आलो वाली बारिश या तेज हवाओं वाली बारिश या चार दिन चलने की आशा लेके आई पर दो घंटों तक भी न चल पीनेवाली बारिश)
फिर अंदाज लगते हुए सोचती है गांव के बारे में। अपने गांव के बारे में, पड़ोसवाले गांव के बारे में, टीवी पे दिखा रहे उस पराए गांव के बारे में। किसान के बारे में, फसलों के बारे में, फसलों को उगने के लिए लगने वाले वक्त के बारे में, उतने वक्त में जरूरत पडनेवाली बारिश के बारे में, बाजार में चल रहे फसल के भावों के बारे में, और बेमौसम हुई, इस तूफानी बारिश से होनेवाले नुकसान के बारे में। "देर से आई है, ऊटपटांग सी बरस रही है, यह बारिश रूठी तो नहीं?" जैसे खयालों के बारे में।
आज तक, मैंने जब जब बारिश देखी, हमेशा सुकून देखा।
हरियाली देखी, पंछी देखे, तेजी से दौड़ते बादल देखे।
झूमते पेड़ देखे, घूमते बच्चे देखे, पकोड़े देखे, चाय देखी।
दादी ने भी वही बारिश देखी। पर कुछ और देखा।
वह बड़े से, भींगो के चश्मों के पीछे छिपी, दो, समंदर सी गहरी, आंखों ने जब जब बारिश देखी, शायद भविष्य देखा।
रुखी धरती देखी, रूठी पृथ्वी देखी, डूबती दुनिया देखी।
सोचती हु कि कैसे दादी की बारिश कम होती जा रही है। और कैसे दादी सा बारिश देखना ही इस डूबती दुनिया को बचा सकता है।
संस्कृती
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I read a poem called “Three Questions.” By Caitlyn Seihl. And irrespective of how spiritually heart-melting it is, I want to request the poet, “please make it four.” Make it four, and once you are done asking about rains and dogs and fear; please ask him about his anger. Ask, what does he do when he gets angry? Does he even acknowledge that he gets angry? Angry around dogs? Angry in the rain? When angry, what does he think he turns into: Sane, Men (like my father who threw food-filled-plates, my teacher who slapped with slates, my neighbour who hurled abuses, my school boyfriend who tore my notebook pages, or my after-school boyfriend who - with his muscular, rugged, vein-y hand which caught my attention the first time I saw him – held me by my chin, I didn’t know what to do, it felt like a sin) or Insane. Does he bang doors? Abandon me in stores? Throws the chairs? Or pull my hairs? Punching on the wall - Does that make him feel stronger? Dear Poet, please ask, is he afraid of his own anger? I wonder, when angry, does he remember his answers about dogs and the rain, because if not, then, my mother has told me, that the first three answers go in vain.
Sanskruti
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बचपन में, हमारे हॉल की, टीवी वाली, नारंगी दीवार पे, हररोज, देर शाम को, ठीक उसी समय जब हम खाना खा रहे होते थे, दो छिपकलियां, एक दूसरे से मिलने आती थी।
वह आती थी दो कोनो से। एक किचन की तरफ से और दूसरी गार्डन की तरफ से। और वह मिलती थी ट्यूबलाइट की रोशनी के बीचों बीच।
हमने उनका नामकरण भी किया था, उमा और तारा। पापा का मानना था कि वह वह आती है ट्यूबलाइट पे लगे कीड़े खाने। मम्मा का मानना था कि उन्हें, हमारे साथ, टीवी देखते देखते, खाना खाना पसंद है।
फिर साल बीते। नारंगी दीवार सफेद हुई। ट्यूबलाइट निकाली गई। सीलिंग पे छोटी छोटी लाइटें लगाई गई। खाने का वक्त बदल गया, और किसीको महसूस नहीं हुआ पर हमारा परिवार उमा और तारा को भूल गया।
इसलिए, बस इसी लिए, मै यह लिख के रखना चाहती हु की: जब तुम और मैं, हम दोनों, अपना, दिन भर का काम खत्म करके, देर शाम को मिलेंगे, तब, तुम, मुझसे, वह हल्की पीली, हल्की नारंगी स्ट्रीटलाइट की रोशनी के बीचों बीच मिलना।
संस्कृती
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दिवाली है। मैं घर आई हु।
मेरा घर। मेरी रूम वाला घर।
मम्मा पापा वाला घर। बचपन वाला घर।
दिन भर, मैं बोहोत सारी चीज़े करती हु।
घर के बाहर, सर्दी की कोमल धूप में,
अड़ोस पड़ोस के बच्चो को, खुले आंगन में,
किलकारियां भरते सुनती हू।
मेरे घर के पीछे रहनेवाला एक बच्चा हररोज, सुबह एक घंटा,
दिवाली की छुट्टियों का होमवर्क करता है, और उसके बाद दिन भर
यहां से वहा छल्लांगे लगाता है।
सोचती हु कि कैसे,
गाजा में भी सर्दी है। धूप है।
अड़ोस है। पड़ोस है।
बच्चे भी है। पर होमवर्क नहीं है।
होमवर्क होगा भी तो वह करने के लिए घर नहीं है।
जो बचे कूचे है, वो घर होकर भी घर रहे नहीं है।
गर्मी की छुट्टियां है। मैं घर आई हु।
मेरा घर। मेरी रूम वाला घर।
मम्मा पापा वाला घर। बचपन वाला घर।
दिन भर, मैं बोहोत सारी चीज़े करती हु।
घर के बाहर, तलवे जलानेवाली गर्मी में,
अड़ोस पड़ोस के बच्चो को, किसी पेड़ की ठंडी छाव में,
किलकारियां भरते सुनती हू।
मेरे घर के पीछे रहनेवाला वही बच्चा हररोज, सुबह एक घंटा
गर्मी की छुट्टियों का होमवर्क करता है और उसके बाद दिन भर
यहां से वहा छल्लांगे लगाता है।
सोचती हु कि कैसे,
गाजा में भी धूप है। पेड़ है।
अड़ोस है। पड़ोस है।
पर अब बच्चे नहीं हैं।
जो बचे कूचे है, वो बच्चे होकर भी बच्चे रहे नहीं है।
इस साल दिवाली में, मैं वापिस घर जाऊंगी।
मेरा घर वही पे होगा जहां पिछली बार था।
धूप भी होगी, सुबह भी होगी,
आंगन भी होगा, किलकारियां भी होगी,
वो घर के पीछे रहनेवाला बच्चा भी होगा।
पर, शायद, गाजा नहीं होगा।
जो बचा कूचा है, वो गाजा होकर भी गाजा सा रहा नहीं होगा।
कितनी लज्जासपद बात है कि,
हमारी आंखों के सामने
होमवर्क को, घरों को, बच्चों को,
बच्चों की किलकारियां से बने एक संपूर्ण संस्कृति को,
मिटाया गया।
पर हमने कुछ नहीं कहा।
जो बचा कूचा है, उसे मिटाया जा रहा है।
पर हम कुछ नहीं कह रहे।
हम दिवाली पे घर जाते रहे,
हम दिवाली पे घर जा रहे है।
संस्कृती
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बचपन दोस्त है। बचपना प्रेयसी।
संस्कृती
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जून महीने के किसी दिन, एसबीआई में कुछ कागज़ जमा कराने गयी हुई थी, तब नज़र पड़ी, पड़ोसवाले एक स्टेशनरी दुकान के सामने लगी भीड़ पे।
ब्राउन कवर्स, कैमलिन क्रेयोंस, ग्रामर बुक, क्राफ्ट पेपर्स, स्काई बैग, बेन टेन स्टिकर्स और अप्सरा पेंसिल के लिए लगी हुई भीड़. भीड़ जो कुछ साल पहले तक भीड़ नहीं लगती थी।
दो चित्र - एक पहाड़ का और दुसरा मोटरसाइकिल का. दोनो में से कोई एक चित्र के कवर वाली नोटबुक चुनने की कश्मश में खोया एक छोटासा बच्चा देखा, और अचानक से महसूस हुआ की,
बचपन एक दोस्त था, जिसका बचपन में देहांत हो गया. और उसके गुजरने की खबर मिली है आज, कुछ सालो बाद. जिसके गुजरने की खबर मिलती रहती है, बार बार, कई बार, आज भी, इतने सालों बाद।
संस्कृती
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— Megan Fernandes, “Do You Sell Dignity Here?” from I Do Everything I’m Told
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सुनो, जो भी काम में व्यस्त हो, वो थोड़ा बाजू रख के,
क्या मुझसे मिल सकते हो?
माना देरी नहीं हुई है, लेकिन मुझे जल्दी है थोड़ी।
वो, दरअसल, मुझे, तुम्हे, घूमाने ले जाना है।
उस नदी के छोटे वाले किनारे,
जहा हररोज शाम को मछलियां झुंड बनाके
जमीन का दर्शन करने आती है।
मछुवारे से नही डरती है।
क्योंकि एक अबोल समझौता है उनमें
की सुबह मछुवारे की होगी, और शाम मछलियों की।
वो, दरअसल, मुझे, तुम्हे, घूमाने ले जाना है।
नदी को तुमसे मिलाने ले जाना है।
उस्सी नदी के किनारे बैठ,
आधा पिघला कॉर्नेटो आइसक्रीम कोन खाना है,
वो आइसक्रीम के कागज़ों को हाथों में संभाल के रखना है,
हाथ को घर मान बैठी चॉकलेट की उस हल्की सी परत को, धोने के बहाने से, पानी में उतरना है।
किसी बच्चे सा, बेफिक्र, पानी उछालना है,
फिर गीले पाऊं लिए, वापिस उन icecream के कागज़ों के पास चले आना है।
मुझे तुम्हे घूमाने ले जाना है।
उन मछलियों का खेल दिखाने ले जाना है।
माना देरी नहीं हुई है, लेकिन मुझे जल्दी है थोड़ी।
मुझे जल्दी है थोड़ी, क्योंकि कॉर्नेटो अब मिलता नहीं है,
मिलता है तो पिघलता नहीं है,
जब से कलम छोड़ लैपटॉप चुना है,
चॉकलेट हाथों को घर कहता नहीं है,
वो किनारा, वो नदी सुख रही है,
पीली नाव, बाजार में, बिक रही है।
मछुवारा धंधा बदल रहा है,
और मछलियां खत्म हो रही है।
इसलिए, सुनो, जो भी काम में व्यस्त हो, वो थोड़ा बाजू रख के,
क्या मुझसे मिल सकते हो?
माना देरी नहीं हुई है, लेकिन मुझे जल्दी है थोड़ी।
वो, दरअसल,
जब तक नदी है, नाव है, मछली है, मछुआरा है,
लैब में बना नहीं, सृष्टि निर्मित वारा है,
तब तक, या उससे पहले,
मुझे, तुम्हे, घूमाने ले जाना है।
Sau
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"Being LGBTQIA+ isn't something millennials invented," "You aren't seeing an increase, you're seeing how many people were once silenced."
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There is a natural human impulse to protect children. To grab a toddler, you don’t know, if you see them running into traffic; and if that impulse is broken or disincentivized by a Government, then there absolutely is a humanitarian crisis.
John Oliver
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I suppose, I love this life even with a clenched fist
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जिसने चूमा हो मां की हथेली को कभी, उसे पता होगा
की मां की हथेली पे, लकीरों के साथ साथ, रहता है:
कल रात की सब्जी में डाले प्याज का गंध, इलायची का सुगंध,
हल्दी का रंग, मिर्ची के संग।
तुम्हारे भविष्य की चिंता, वो कष्ट जो कभी कोई नही गिनता,
क्रोसिन का सुराग, मुस्कान के पीछे छिपाती वो विराग।
वेणी से झड़कर हात से लिपटा एक बाल,
वो ढलती नेल पॉलिश जो लगाई थी पिछले साल।
पूरे वर्ष का हिसाब, आज करने कामों का सैलाब,
बस तुम खुश रहो, यही एक मुराद,
और पूरे घर को बुनियाद,
रहती है मां की हथेली पे, लकीरों के साथ साथ।
संस्कृती
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मुझे, मेरी मां ने, कविता लिखना सिखाया था।
सिखाया था की, कैसे, कविता लिखना कभी सिखाया नहीं जा सकता।
गरम रोटी मिले छालो की आग को मिटाया नहीं जा सकता।
तुम्हे पढ़ना होगा, उनसे लड़ना होगा, भेड़ियों से भिड़ना होगा, उनकी नाक पे पैर देकर उड़ना होगा।
मान्यता के अभाव में, रूखी पड़ी जख्मों को,
पीए गए शब्दो को, आंसुओ को, उन आंखों को,
भुलाया नहीं जा सकता।
पता है, मेरी मां एक कविता है।
मुझे खुद कविता ने सिखाया था की कैसे, कविता लिखना कभी सिखाया नही जा सकता।
संस्कृती
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There were days when these two years felt like two decades, but the silver lining is, there were also days when these two years felt like two hours; and on days when the ceiling stares back at me as I struggle to sleep, in my nasal voice, I tell myself, "You do all that you do, you should continue to do all that you do, for that two hours shit!"
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If you ever want to love me,
Please love me the most non-conventional way.
I want that smiles and laugh love,
I want that silence and stares love.
I wont deny that I am a Rose person,
But if you want to bring me anything, go for green leaves and dry twigs;
Or a fruit basket full of apples, litches and figs!
Dont accompany me to movies,
I tend to enjoy them alone, in solitude.
Actually, they are meant to be watched in silence,
I mean if you dont take this as rude!
Love me like you love your food,
Your books. Your ideas of love.
Treat love like Love,
Your love, my love, our Love.
Like peace is for Dove.
Read me the lines that are penetrated in your skin -
The way, raindrops penetrate in the dreary, lifeless soil!
Lets read poems, lets recite shayaris,
When you hold my hand I am a listener tell me all the memories
Of school recess, your favourite coffee from favourite cafes,
How, once, you took a stand for maggie,
Got into a fight, clothes turned shaggy.
Your first mobile, you lost the documents file,
While dreaming the most absurd dream, fell off the bed in style!
Listen, if you ever want to love me, You will have to love yourself more,
Of course, I wont keep the score;
But, if you tell me that you love your Books more than me, I wont turn sore, rather adore.
Because, I too cant love you. ONLY you.
It will always be a bunch, of - my friends, my words, my shenanigans and you,
Not in that order to be true!
But yes, all I have to say is,
If you ever happen to love me, please love me your way,
Love me my way,
Please love me the Love way!
Sanskruti
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याद है, उस दिन जब हम, उस बगुले के आकार वाले एक बादल का पीछा करते,
कुछ चार मील चलते,
दुनिया जहां की बातो को, हल्दी सा, मुस्कानों के पीछे छिपाई जख्मों पे मलते,
पक्षियों को पहचानते, चूकते, पतंगों को ललकारते,
पत्थरो को उड़ाते, एक दूसरे को चिढ़ाते,
बस चल रहे थे, चलते जा रहे थे,
और, अचानक से, तुम रुक गए।
तुम रुक गए, ताकि, ओरियो बिस्कुट के टुकड़े ले जा रही चिटियो की कतार को देख पाओ,
चार मिल चलकर फूल चुकी सांसों को रोक पाओ,
एक अंजान पेड़ के नीचे बैठ, शाम की रोशनी में अपनी कुम्हार सी कलात्मक हथेलियों को सेक पाओ,
कुछ पुरानी जख्मों को, बस यूं ही, मजे के लिए, नोक पाओ।
पता है, उस पल में मुझे पता था की, मैं तुम पे एक कविता लिखना चाहती हूं।
संस्कृति
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